Tuesday, December 4, 2012

डाटा सुरक्षा और भारत-यूरोपीय संघ व्यापार वार्ता

           वाणिज्य पर *समीर पुष्प का विशेष लेख 
  कहा जाता है कि डाटा यानि आंकड़े व्यापार के लिए नए कच्चे माल जैसे हैं। यह एक नया ईंधन है, जिससे व्यापार आगे बढ़ता है और इस धरती पर आजीविका चलती है। प्रौद्योगिक उन्नति और वैश्वीकरण ने डाटा एकत्र करने, डाटा तक पहुंच और इसके इस्तेमाल के तरीकों को काफी बदल दिया है। टिम बर्नर्स ली का कहना है-डाटा एक मूल्यवान वस्तु है और प्रणालियों के मुकाबले यह ज्यादा समय तक कायम रहेगी।
जैसा कि हम जानते हैं कि भारत और यूरोपीय संघ के संबंध 1960 के दशक के शुरू में ही प्रारंभ हो गए थे। भारत उन पहले कुछ देशों में शामिल था, जिन्होंने तत्कालीन यूरोपीय आर्थिक समुदाय (ईईसी) के साथ कूटनयिक संबंध स्थापित किए थे। शुरू में ये संबंध व्यापार और आर्थिक मुद्दों से जुड़े हुए थे, लेकिन अब ये तेजी से बढ़कर सभी क्षेत्रों में सहयोग के संबंध बन गए हैं। दोनों पक्ष सामरिक साझेदारी पर सहमत हैं और उन्होंने एक संयुक्त कार्य योजना को स्वीकार किया है। आज यूरोपीय संघ हमारे सबसे बड़े व्यापारिक साझेदारों में से एक है, हमारे लिए प्रौद्योगिकी का एक महत्वपूर्ण स्रोत है और वहां बड़ी संख्या में प्रभावशाली भारतीय प्रवासी रहते हैं। व्यापार और निवेश अभी भी हमारे द्विपक्षीय संबंधों का महत्वपूर्ण पहलू बने हुए हैं, लेकिन इसके साथ ही इन संबंधों में बहुत गुणात्मक परिवर्तन आया है और दोनों पक्ष नई और उभरती चुनौतियों के प्रति एक समान दृष्टिकोण विकसित करने का प्रयास कर रहे हैं।
25 जनवरी, 2012 को यूरोपीय आयोग ने यूरोपीय संघ के 1995 के डाटा सुरक्षा नियमों में व्यापक सुधार का प्रस्ताव किया, ताकि डाटा के मामले में ऑनलाइन गोपनीयता के अधिकारों को मजबूत किया जा सके और यूरोप की डाटा आधारित अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाया जा सके। यूरोपीय संघ के 27 सदस्य देशों ने 1995 के नियमों को अलग-अलग ढंग से लागू किया था, जिससे इनमें अंतर आ गया था। अकेले एक कानून से मौजूद विभिन्नताओं और खर्चीली प्रशासनिक व्यवस्थाओं से बचा जा सकेगा, जिससे एक वर्ष में लगभग 2.3 अरब यूरो के व्यापार के लिए बचतें होंगी। इस कदम से ऑनलाइन सेवाओं में उपभोक्ताओं का विश्वास मजबूत बनाने में मदद मिलेगी, जिससे यूरोप के लिए अति आवश्यक विकास, नौकरियों और नवीकरण की परियोजनाओं को बढ़ावा मिलेगा।
भारत के सामने अपने मानव संसाधनों के लिए विदेशों में और विशेष रूप से यूरो जोन में कार्य के अवसर जुटाने तथा विभिन्न प्रकार के कानूनों से निपटने की समस्याएं आईं। भारत की अर्थव्यवस्था को सेवाओं की अर्थव्यवस्था समझा जाता है। पिछले एक दशक में भारतीय अर्थव्यवस्था में जो उच्च विकास दर प्राप्त की गई है, उसका कारण देश में सेवा क्षेत्र का विकास होना है। भारत के कुल व्यापार में सेवा क्षेत्र का योगदान लगभग 30 प्रतिशत है, निर्यात में लगभग 40 प्रतिशत है और आयात में इसका हिस्सा 25 प्रतिशत है। इसके कारण देश में 50 प्रतिशत से अधिक प्रत्यक्ष विदेशी निवेश हुआ है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर देखा जाए, तो हाल के वर्षों में भारत ने सेवाओं के निर्यात में सबसे अधिक वृद्धि दर हासिल की। 2000-08 के वर्षों में औसतन वृद्धि दर 27 प्रतिशत रही, जबकि वैश्विक वृद्धि दर 14 प्रतिशत थी।
उपरोक्त मजबूती के कारण विश्व व्यापार संगठन – डब्ल्यूटीओ में और द्विपक्षीय मुक्त व्यापार समझौते में सेवाओं के बारे में हुई वार्ताओं में भारत की स्थिति ‘मांगकर्ता’ जैसी थी। इन वार्ताओं के पीछे उद्देश्य यही था कि हमें अपनी सेवाओं के निर्यात के लिए अधिकतम और प्रभावी बाजारों तक पहुंच हासिल हो सके। अपेक्षतया लाभ की स्थिति में होने के कारण सेवा क्षेत्रों में हमने अपने महत्वपूर्ण अनुरोधों में सीमापार आपूर्ति (मोड-एक) और स्वाभाविक रूप से आवश्यक लोगों को भेजने (मोड-चार) की उपयोगी शर्तों पर जोर दिया। भारत के लिए महत्वपूर्ण दिलचस्पी का एक क्षेत्र यह रहा कि योग्यताओं और लाइसेंस संबंधी आवश्यकताओं तथा प्रक्रियाओँ से संबंधित घरेलू नियमों में नए आयाम तय किए गए, जिनके बिना मोड चार को हासिल करने में भारी रुकावट आती थी।
नवम्बर 2012 में कराधान और कस्टम्स के यूरोपीय आयुक्त श्री अल्गीरदास सेमेता के साथ द्विपक्षीय बातचीत के दौरान केंद्रीय वाणिज्य, उद्योग और कपड़ा मंत्री श्री आनंद शर्मा ने भारत यूरोपीय संघ के बीच महत्वकांक्षी और संतुलित द्विपक्षीय व्यापार और निवेश समझौते को जल्दी संपन्न करने की आवश्यकता पर जोर दिया। श्री शर्मा ने कहा कि समझौते का संतुलित होना आवश्यक है और इसमें भारत की दिलचस्पी वाले क्षेत्रों जैसे, मोड-एक और मोड-चार के माध्यम से सेवाओं की उपलब्धता, कृषि बाजार तक पहुंच और व्यापार में तकनीकी बाधाओं पर नियंत्रण जैसे मुद्दों पर ध्यान दिया जाना चाहिए, ताकि प्रभावशाली बाजारों तक पहुंच के लिए उपलब्ध रियायतों का इस्तेमाल किया जा सके। उन्होंने कहा कि भारत यूरोपीय संघ के बीच द्विपक्षीय व्यापार और निवेश समझौते में समुचित संतुलन के लिए यह महत्वपूर्ण है।
श्री शर्मा ने इस बात पर जोर दिया कि पहुंच उपलब्ध कराने के लिए मोड-एक में भारत को डाटा सुरक्षा वाला पक्ष घोषित करने की आवश्यकता होगी। यूरोपीय संघ इस बात के मूल्यांकन के लिए अध्ययन कर रहा है कि भारत के कानून यूरोपीय संघ के निर्देश के अनुकूल हैं या नहीं। श्री शर्मा ने कहा कि यह हमारा स्पष्ट मत है हमारे मौजूदा कानून यूरोपीय संघ के मानदंडों को पूरा करते हैं। मैं आग्रह करूंगा कि भारत को डाटा सुरक्षा वाला देश घोषित करने के मुद्दे को जल्दी सुलझा लिया जाए, क्योंकि लगभग सभी बड़ी फार्च्यून-500 कंपनियों ने अपने महत्वपूर्ण डाटा के साथ भारत में विश्वास व्यक्त किया है।
भारत ने हाल में सुधार के कई कदम उठाए हैं। इनमें मल्टी ब्रांड खुदरा व्यापार क्षेत्र को विदेशी निवेशकों के लिए खोलना, सिंगल ब्रांड वाले उत्पादों के खुदरा व्यापार में एफडीआई के लिए शर्तों को लचीला बनाना, ऊर्जा की आदान-प्रदान व्यवस्था में एफडीआई की अनुमति देना, प्रसारण क्षेत्र में एफडीआई की सीमा को बढ़ाना और नागरिक उड्डयन क्षेत्र में विदेशी विमान सेवा कंपनियों के जरिए एफडीआई की अनुमति देना शामिल है। श्री शर्मा ने कहा कि इन उपायों से भारत अवसंरचना से लेकर खाद्य प्रसंस्करण, नवीकरणीय ऊर्जा, स्वच्छ प्रौद्योगिकी, जैव-प्रौद्योगिकी, स्वास्थ्य सेवाएं जैसे क्षेत्रों में निवेश की दृष्टि से एक पंसदीदा देश बन गया है। उन्होंने कहा कि यूरोपीय संघ 20 से अधिक देशों का संघ है और जिन क्षेत्रों में भारत को निवेश की आवश्यकता है, लगभग उन सभी क्षेत्रों में इन देशों की मजबूत स्थिति है। श्री शर्मा ने कहा कि यूरोपीय संघ के कई देश विनिर्माण उद्योगों के लिए आवश्यक हरित और स्वच्छ प्रौद्योगिकी सहित अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी विकास के मामले में विशेष रूप से सक्षम हैं। हालांकि यूरोपीय संघ के साथ तकनीकी सहयोग के लगभग 50 प्रतिशत मामलों में अनुबंध हैं, लेकिन विनिर्माण क्षेत्र की विभिन्न गतिविधियों में प्रौद्योगिकी हस्तांतरण को बढ़ाने की अभी और भी संभावनाएं हैं।
अप्रैल 2000 से जुलाई 2012 के बीच यूरोपीय संघ से भारत में 44.31 अरब अमरीकी डॉलर का सामूहिक प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) हुआ, जबकि अप्रैल 2004 से अक्टूबर 2009 के बीच भारत की ओर से यूरोपीय संघ में प्रत्यक्ष निवेश लगभग 20 अरब डॉलर था।
श्री शर्मा ने यूरोपीय संघ के साथ बढ़ते द्विपक्षीय संबंधों पर भी प्रसन्नता व्यक्त की और कहा कि ये संबंध लोकतंत्र, व्यक्तिगत अधिकारों और सतत विकास के प्रति निष्ठा के एक समान मूल्यों पर आधारित हैं। वर्ष 2010 में भारत और यूरोपीय संघ के बीच 83.372 अरब अमरीकी डॉलर का व्यापार हुआ जो 2011 में 110.268 अरब डॉलर का हो गया। जनवरी से सितम्बर 2012 के नौ महीनों में 76.511 अरब अमरीकी डॉलर का द्विपक्षीय व्यापार हुआ।
फार्मास्युटिकल्स और कृषि रसायनों जैसे क्षेत्रों के आंकड़ों में उत्पाद की सुरक्षा और उसकी प्रभावशीलता काफी महत्वपूर्ण है, इसलिए इन क्षेत्रों से संबंधित आंकड़ों की नियमन स्वीकृति प्राप्त करना और भी बड़ा और अधिक खर्चीला काम है। इसलिए इन क्षेत्रों के आंकड़ों को तैयार करने के लिए प्रोत्साहन देने की आवश्यकता है और यह निवेश को सुरक्षा प्रदान करके दिया जा सकता है। बौद्धिक संपदा अधिकार के व्यापार संबंधी पहलुओं पर समझौते के अनुच्छेद 39.3 में इन क्षेत्रों में इस प्रकार की सुरक्षा की आवश्यकता को बौद्धिक संपदा अधिकार माना गया है। इस अध्याय में बताया गया है कि कैसे कुछ क्षेत्रों ने और विशेष रूप से यूरोपीय समुदाय ने नियमन डाटा सुरक्षा व्यवस्था की आवश्यकता वाले इस समझौते को लागू किया है। यह सुरक्षा, पेटेंट प्रणाली में नहीं है, जो केवल आविष्कार के लिए सुरक्षा प्रदान करती है।
विश्व इस समय आर्थिक संकट से उबरने की ओर अग्रसर है। इस दृष्टि से यह हमारे लिए एक अवसर है कि हम एक महत्वपूर्ण आर्थिक शक्ति के रूप में अपनी क्षमता का निर्माण करें और उसे बढ़ाएं। विश्व के आर्थिक परिदृश्य में हाल के परिवर्तनों से पता चलता है कि विकास का केंद्र अब हमारे समय क्षेत्र में आ गया है। भारत के संसाधनों, इसके आकार और जनसंख्या की विशिष्टता से ऐसी स्थिति बनी है, जिसमें हम सेवा क्षेत्र से अधिक लाभ उठा सकते हैं और निश्चित रूप से इसका संबंध विकास से है। समय तेजी से बदल रहा है और विश्व भारत की ओर देख रहा है कि वह बदलती वैश्विक आर्थिक स्थिति के परिदृश्य में आर्थिक जीवन नौका के रूप में सक्रिय भूमिका अदा करे। कौशलयुक्त मानव संसाधनों का सशक्त आधार और लोगों की भागीदारी से भारत एक ऐसी ऊंची स्थिति में पहुंच सकता है, जिसके लिए वह बहुत लंबे समय से हकदार है।

(पीआईबी फीचर) 03-दिसंबर-2012 15:49 IST

*लेखक स्‍वतंत्र पत्रकार हैं।

नोटः इस लेख में व्‍यक्‍त विचार लेखक के अपने हैं और यह जरूरी नहीं है कि पत्र सूचना कार्यालय उनसे सहमत हो।          

मीणा/राजगोपाल/अर्जुन

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