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Thursday, August 1, 2024

क्या नालंदा महाविहार को बख्तियार खिलजी ने नष्ट किया था?

 Monday 1st July 2024 at 10:33 AM

कहीं नहीं लिखा है कि खिलजी नालंदा आया या उसने ऐसा किया

नालंदा विश्वविद्यालय के नए कैंपस का उद्घाटन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 19 जून (2024) को किया।  इस मौके पर म्यांमार, श्रीलंका, वियतनाम, जापान और कोरिया के राजदूतों सहित अनेक गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे। इन देशों में से अधिकांश में बौद्ध धर्म सम्राट अशोक द्वारा भेजे गए प्रचारकों के ज़रिये फैला था। नालंदा को पुनर्जीवित कर उसे एक वैश्विक विश्वविद्यालय का स्वरुप देने का प्रस्ताव सबसे पहले 2006 में तत्कालीन राष्ट्रपति ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने किया था। बाद में बिहार विधानसभा और यूपीए सरकार ने इसका अनुमोदन किया। 

इस अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में भाषण देते हुए, मोदी ने कहा कि बारहवीं सदी में विदेशी हमलावरों ने इस विश्वविद्यालय को जला कर राख कर दिया था। वे इसी आम धारणा को दुहरा रहे थे कि महमूद गौरी के सिपहसालार बख्तियार खिलजी ने नालंदा विश्वविद्यालय को नष्ट किया था। 

यह धारणा उसी सामाजिक सोच का हिस्सा है जो मानती है कि मुस्लिम आक्रांताओं ने हिन्दू मंदिरों को नष्ट किया और तलवार की नोंक पर लोगों को इस्लाम अपनाने पर मजबूर किया। इस सोच की नींव ब्रिटिश काल में पड़ी थी जब अंग्रेजों ने देश के इतिहास का साम्प्रदायिक नजरिए से लेखन किया। अंग्रेजों के बाद उनकी इस विरासत को आगे बढ़ाने का काम हिन्दू और मुस्लिम साम्प्रदायिक ताकतों ने किया। 

मुस्लिम लीग द्वारा हिन्दुओं के बारे में फैलाए गए मिथकों के कारण पाकिस्तान में हिन्दुओं का जीना मुहाल हो गया वहीं आरएसएस ने भारत में मुसलमानों के खिलाफ नफरत फैलाने का काम बखूबी अंजाम दिया। यहां तक कि सरदार वल्लभ भाई पटेल को आरएसएस के बारे में यह लिखना पड़ा कि “उनके सभी भाषण साम्प्रदायिकता से भरे हुए थे। हिन्दुओं को उत्साहित करने और उनकी सुरक्षा के लिए उन्हें लामबंद करने के लिए यह ज़हर फैलाना जरूरी नहीं था। इस जहर का अंतिम नतीजा यह हुआ कि देश को गांधीजी के अनमोल जीवन की बलि भोगनी पड़ी।”

मोदी का यह कहना कि नालंदा को विदेशी हमलावरों ने जलाकर नष्ट किया था झूठी बातों की उसी श्रृंखला का हिस्सा है जो मुसलमानों के खिलाफ नफरत फैलाने के लिए बरसों से इस्तेमाल की जा रही हैं। नालंदा विश्वविद्यालय एक अद्भुत शिक्षण संस्थान था। बिहार के राजगीर में एक बड़े क्षेत्र में फैले इस विश्वविद्यालय का निर्माण गुप्त वंश के सम्राटों ने छठवीं सदी में किया था। इस बौद्ध शैक्षणिक संस्थान में, जहां सभी विद्यार्थी वहीं रहकर अध्ययन करते थे, मुख्यतः बौद्ध दर्शन पढ़ाया जाता था। इसके अतिरिक्त वहां गणित, तर्कशास्त्र, ब्राह्मणवादी हिन्दू धर्म के ग्रंथ एवं स्वास्थ्य विज्ञान भी पढ़ाए जाते थे। यह विश्वविद्यालय अपने खुलेपन, बेलाग संवादों और तार्किकता को बढ़ावा देने के लिए जाना जाता था। इसमें पढ़ने के लिए दूर-दूर से विद्यार्थी आया करते थे। इस विश्वविद्यालय का खर्च मौर्य वंश के राजाओं के खज़ाने से मिलने वाले धन से चलता था। बाद में पाल और सेन राजवंशों का शासन आने के बाद इस विश्वविद्यालय को मिलने वाली मदद कम हो गई और इसकी जगह अन्य विश्वविद्यालयों जैसे ओदंतपुरी और विक्रमशिला को राजकीय सहायता मिलने लगी। यहीं से नालंदा का पतन शुरू हुआ। 

नालंदा विश्वविद्यालय का पुस्तकालय, जिसमें दसियों लाख किताबें, पांडुलिपियां और अन्य दुर्लभ वस्तुएं थीं, को आखिर किसने आग लगाई थी? इसका दोष खिलजी पर मढ़ा जाता रहा है, विशेषकर ब्रिटिश राज के बाद से।  मगर ऐसा एक भी तत्कालीन स्त्रोत नहीं है, जो इसके लिए खिलजी को ज़िम्मेदार ठहराता हो। खिलजी का मुख्य और एकमात्र लक्ष्य था लूटपाट। 

अयोध्या से बंगाल जाते हुए उसने किला-ए-बिहार पर यह सोचकर हमला किया कि उसमें दौलत छिपी होगी। रास्ते में उसने लूटमार की और लोगों को मारा। नालंदा उसके रास्ते में नहीं था, बल्कि जिस रास्ते से वह गुजरा, नालंदा उससे काफी दूर था। और वैसे भी उसके पास किसी विश्वविद्यालय पर हमला करने का कोई कारण नहीं था. उस समय के किसी स्त्रोत में यह नहीं कहा गया है कि खिलजी नालंदा आया था। 

मिनहाज-ए-सिराज द्वारा लिखी गई पुस्तक ‘तबकात-ए-नासिरी’ में इस तरह की कोई बात नहीं कही गई है।  उस समय दो तिब्बती अध्येता धर्मस्वामिन और सुंपा नालंदा में भारत और विशेषकर यहां बौद्ध धर्म के इतिहास का अध्ययन कर रहे थे। मगर उन्होंने भी अपनी किताबों में यह नहीं लिखा है कि खिलजी नालंदा आया या उसने नालंदा को आग के हवाले किया। एक अन्य बौद्ध अध्येता तारानाथ, जो तिब्बत से था, भी अपनी पुस्तक में इस तरह की चर्चा नहीं करता।

यह दिलचस्प है कि ‘आक्रांताओं’ ने अजंता, एलोरा और सांची स्तूप सहित किसी महत्वपूर्ण बौद्ध ढ़ांचे या संस्थान को नुकसान नहीं पहुंचाया। इतिहासविद् यदुनाथ सरकार और आर. सी. मजूमदार भी इससे सहमत नहीं हैं कि नालंदा को खिलजी ने नष्ट किया था। तो फिर यह विश्वविद्यालय किस तरह नष्ट हुआ और क्यों और कैसे अपना महत्व खो बैठा? इस बारे में कई कहानियां प्रचलित हैं जिनमें से एक यह है कि उसे खिलजी ने नष्ट किया था।

प्राचीन भारतीय इतिहास के अप्रतिम अध्येता प्रोफेसर डी. एन. झा अपने लेखों के संकलन (‘अगेंस्ट द ग्रेन’, मनोहर, 2020) में प्रकाशित एक लेख ‘रेसपांडिग टू ए कम्युनलिस्ट’ में तिब्बती भिक्षु तारानाथ की भारत में बौद्ध धर्म के इतिहास पर लिखी पुस्तक के प्रासंगिक हिस्सों को उद्धत करते हुए लिखते हैं: “नालेन्द्र (नालंदा) में काकुटसिद्ध द्वारा बनाए गए मंदिर के प्राण प्रतिष्ठा समारोह के दौरान शैतान शमनों ने तीर्थिका भिक्षुकों (ब्राम्हणों) पर गंदगी फैंकी। 

इससे नाराज होकर उनमें से एक आजीविका का इंतजाम करने चला गया और दूसरे ने एक गहरे गड्ढे में बैठकर सूर्य साधना शुरू कर दी...उसने एक यज्ञ किया और पवित्र राख चारों ओर फैला दी जिससे अचानक आग लग गई।”

डी. आर. पाटिल अपनी पुस्तक ‘द एंटीक्वेरियन रेमनेंट्स इन बिहार’ में ‘हिस्ट्री ऑफ इंडियन लाजिक’ को उद्धत करते हुए लिखते हैं कि यह घटना ब्राम्हण और बौद्ध भिक्षुकों के बीच हुए विवाद और संघर्ष की ओर इंगित करती है। ब्राम्हण भिक्षुकों ने सूर्यदेव की उपासना के लिए एक यज्ञ किया और उसके बाद यज्ञ वेदी में से निकालकर जलते हुए अंगारे और गर्म राख बौद्ध मंदिरों में फेंक दी जिसके कारण किताबों के विशाल संग्रह ने आग पकड़ ली।

हमें यह ध्यान में रखना होगा कि भारत में उस समय ब्राम्हणवाद का पुनरूथान हो रहा था और बौद्ध धर्म पर हमले किए जा रहे थे। सम्राट अशोक के शासनकाल में भारत करीब-करीब बौद्ध देश बन गया था। बौद्ध धर्म समानता में आस्था रखता था जिसके कारण आम लोगों में ब्राम्हणवादी कर्मकांडों में रूचि कम हो गई थी। इससे ब्राम्हण बहुत दुःखी और नाराज थे। अशोक के पौत्र और अंतिम मौर्य सम्राट बृहद्रथ की हत्या उसके सेनापति पुष्यमित्र शुंग ने कर दी और उसके बाद उसने बौद्धों का कत्लेआम करवाया। 

सभी विश्वसनीय स्त्रोतों से हमें यही पता चलता है कि ब्राम्हणों ने बदला लेने के इरादे से नालंदा विश्वविद्यालय के पुस्तकालय में आग लगाई थी। इसके लिए बख्तियार खिलजी को दोषी ठहराने के पीछे दो उद्देश्य हैं-पहला, मुसलमानों से नफरत करने के कारणों की सूची में एक और कारण जोड़ना और दूसरा, इतिहास के उस दौर में ब्राम्हणों और बौद्धों के बीच संघर्ष और बौद्धों की प्रताड़ना को छिपाना। 

केवल बौद्ध काल के विश्वविद्यालय के प्रांगण में कार्यक्रम आयोजित करने से कुछ होने वाला नहीं है। बौद्ध शैक्षणिक संस्थाओं से हम जो सीख सकते हैं वह है अकादमिक स्वतंत्रता और खुलापन। आज भारत के विश्वविद्यालयों में वातावरण घुटनभरा है और आज्ञाकारिता को सबसे बड़ा गुण मान लिया गया है। 

ऐसे वातावरण में ज्ञान का विस्तार और विकास नहीं हो सकता। भारत में ब्राम्हणवाद और बौद्ध धर्म के बीच संघर्ष का त्रासद इतिहास हमें यही सिखाता है।                               26 जून 2024

(अंग्रेजी से रूपांतरण अमरीश हरदेनिया. लेखक आईआईटी मुंबई में पढ़ाते थे और सन 2007 के नेशनल कम्यूनल हार्मोनी एवार्ड से सम्मानित हैं)  

Wednesday, February 19, 2020

गुरु गोलवलकर के जन्मोत्सव पर BVM स्कूल में विशेष आयोजन

Wednesday: 19th February 2020 at 3:36 PM
राष्ट्र ऋषि के रूप में याद किया गुरु गोलवलकर को 
लुधियाना: 19 फरवरी 2020: (एजुकेशन स्क्रीन ब्यूरो):: 
हिन्दू राष्ट्रवाद के सबसे बड़े झंडाबरदारों में से एक रहे है माधव राव सदाशिव गोलवलकर जिन्हें संघ के कार्यकर्ता गुरु गोलवलकर के नाम से जानते थे। विवादों और कठिनाईओं के बावजूद गुरु गोलवलकर ने न तो अपने विचार बदले न ही रास्ते। संघ पर प्रतिबंध का समय भी आया और उनकी गरिफ्तारी भी हुई लेकिन वह हमेशां अविचलित रहे।  संघ के कार्यकर्ताओं में शायद ही कोई ऐसा हो जिसके घर में गुरु गोलवलकर की तस्वीर न हो और उनके प्रति मन में आस्था न हो। उन्हें याद करते हुए भारतीय विद्या मंदिर अर्थात बीवीएम स्कूल ऊधम सिंह नगर ब्रांच ने बहुत ही श्रद्धा से मनाया। उनकी तस्वीर, दिव्यता का असंदेश देते भजन गायन और आस्था से भरे अंदाज़ में स्मृतियों की चर्चा बहुत ही  बना रही थी। आजकल के कारोबारी और स्वार्थभरे युग में ऐसे आयोजन बहुत कम ही देखने को मिलते हैं। 
भारतीय विद्या मंदिर ऊधम सिंह नगर में माधव राव सदाशिव गोलवलकर के जन्मोत्सव पर अर्पित किए गए श्रद्धा सुमन सदाशिव गोलवलकर के जन्मोत्सव पर बीवीएम स्कूल  में हुआ विशेष आयोजन एक ऐसा ही आयोजन था जो बहुत ही  यादगारी रहा। 
देश को नई दिशा दिखाने वाले राष्ट्र ऋषि एवं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय संचालक परम पूजनीय श्री माधव राव सदाशिव गोलवलकर जी की जयंती पर आज भारतीय विद्या मंदिर ऊधम सिंह नगर में विशेष प्रातः कालीन सभा का आयोजन किया गया। प्रधानाचार्या ने उप प्रधानाचार्या तथा विद्यार्थियों सहित उन्हें श्रद्धा सुमन अर्पित किए।विद्यालय की अध्यापिका सीमा गुप्ता ने गुरु जी के जीवन पर प्रकाश डालते हुए बताया कि उन्होंने निष्काम भाव से लोगों की सेवा करते हुए समाज के हित में आगे बढ़कर कुप्रथाओं का विरोध किया। वे यह मानते थे कि यदि मानव के हृदय में परहित का भाव आ जाए तो घृणा का भाव स्वतः ही लुप्त हो जाएगा। छठी से आठवीं कक्षा के छात्रों के शब्द गायन  'गुरु माधव जी को शत शत नमन' ने सब को भावविभोर कर दिया। छात्रों को गुरु जी द्वारा दर्शाए गए आदर्श मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करने हेतु  पी.पी.टी. दिखाई गई।
गौरतलब है कि गुरु गोलवलकर महाभारत का एक श्लोक सुनाते हुए अक्सर कहा करते थे कि राजनीति वैश्याओं का धर्म है इसलिए संघ के कार्यकर्ता इससे दूर रहें। आज जबकि राजनीति कुछ बन गई है उस समय गुरु गोलवलकर के कहे शब्द अत्यधिक प्रासंगिक बन गए हैं। 

Wednesday, March 12, 2014

देवकी देवी जैन जी का जन्मदिन सेमिनार करके मनाया

Wed, Mar 12, 2014 at 3:25 PM
डा. ओझा ने दी  इतिहास पर रौचक जानकारी 
लुधियाना:12 मार्च 2014: (शिक्षा स्क्रीन ब्यूरो): 
शोर शराबे से भरे हल्के आयोजनों से हट कर डीडी जैन महिला कालेज ने एक और विशेष आयोजन कराया। यह एक राष्ट्रीय सेमिनार था जो पंजाब के प्रारंभिक मध्यकाल के दौरान राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक संक्रमणकालीन चरण प् विशेष चर्चा करने के लिए आयोजित कराया गया। इस एक दिवसीय संगोष्ठी प्रायोजित किया था पंजाब यूनिवर्सिटी चंडीगढ़ के ICSSR विभाग ने। गौरतलब है कि आज के इस शुभ दिन इस कालेज  की मुख्य प्रेरणा स्रोत देवकी देवी जैन जी का जन्मदिन भी था। इस शुभ अवसर पर कालेज ने एक गंभीर और खो चुके विषय पर संगोष्ठी करा कर जहाँ कालेज की छात्रायों को एक ज्ञान भरी सौगात दी वहीँ इतिहास में रूची रखने वाले अन्य लोगों के लिए भी एक नया सिलसिला शुरू किया। कार्यक्रम के दो तकनीकी स्तर थे जिनमें दस शोध पत्र प्रस्तुत किये गए। 
सेमिनार  शुरूआत औपचारिक ज्योति प्रज्वलित करके हुई। इस मौके पर हमेशां की तरह णमोकार मंत्र का उच्चारण भी किया गया। वक्ताओं और मेहमानों का स्वागत बहुत ही सम्मान और गर्मजोशी से किया गया। पंजाब यूनिवर्सिटी चंडीगढ़ से आये डा. एन के ओझा पहले सेशन के मुख्य वक्ता थे जबकि उनके साथ ही चंडीगढ़ से आये डा. अश्विनी अग्रवाल दुसरे तकनीकी स्तर के मुख्य वक्ता था। इस यादगारी मौके पर जानेमाने समाज रत्न और कालेज के की प्रबंधन समिति के चेअरमैन श्री हीरा लाल जैन, कालेज के प्रधान केदारनाथ जैन, सचिव बिपन जैन, मैनेजर सुरिंदर कुमार जैन, राज कुमार जैन, श्री शांति सरूप जैन, और वरिष्ठ उपाध्यक्ष शीतल कुमार जैन, उप प्रधान और अन्य वशिष्ठ लोग भी मौजोड़ रहे।  
अपने मुख्य भाषण में में डा. एन के ओझा ने पंजाब के राजनीतिक पर इतिहास पर बहुत ही दिलचस्प तरीके से बॉट ही अमूल्य जानकारी दी। उन्होंने छठी और 12वीं सदी के कार्यकाल का एक नक्शा सा ही खींच दिया। उन्होंने उस समय की राजनीति के साथ पंजाब की आर्थिक हालत, धर्म-कर्म और संस्कृति की भी जानकारी दी। 
आये हुए डेलीगेटों ने अपने अपने शोधपत्रों में छूयाछात, महिलायों की हालत और बहुत से अन्य मुद्दों पर भी जानकारी दी। समापन सेशन के मुख्य मेहमान थे डाकटर आर के शर्मा।  उन्होंने ने भी इस विष पर बहुत ही जानकारी दी।  कालेज की प्रिंसिपल सरिता बहल ने आये हुए मेहमानों का धन्यवाद किया।समापन रिपोर्ट के साथ ही प्रमाणपत्र भी दिए गए और राष्ट्र गान के साथ ही कार्यक्रम सम्पन्न हुआ।